नई दिल्ली। असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में अप्रैल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होने वाले हैं। युद्ध की थकान, महंगाई की मार, पेट्रोल-गैस की किल्लत और विदेश नीति पर उठते सवालों के बीच मोदी सरकार को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव आयोग ने इन पांच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेश के चुनावी कार्यक्रम की घोषणा कर दी है, जिसमें पश्चिम बंगाल में दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में मतदान होगा, जबकि असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल तथा तमिलनाडु में 23 अप्रैल को एक चरण में वोटिंग होगी। सभी जगहों पर मतगणना 4 मई को होगी।

डीडी भारती न्यूज नेटवर्क के अनुसार, युद्ध के बाद आमतौर पर राष्ट्रवाद का उबाल सरकार को फायदा पहुंचाता है, लेकिन इस बार स्थिति अलग है। पेट्रोल-एलपीजी की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन पर दबाव और आम आदमी की रसोई पर पड़ता सीधा असर भाजपा की राह मुश्किल बना रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि जनता अब सिर्फ राष्ट्रवाद या मजबूत नेतृत्व नहीं, बल्कि रोजमर्रा की मुश्किलों और राहत का भी हिसाब मांग रही है।
बीजेपी के सामने मुख्य चुनौतियां
- क्षेत्रीय दिग्गजों का मजबूत नैरेटिव: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ‘दिल्ली बनाम बंगाल’ और ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ का मुद्दा जोर-शोर से उठा रही हैं। तमिलनाडु में एमके स्टालिन द्रविड़ पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों नेता अपने राज्यों में सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक भावना बन चुके हैं।
- महंगाई और आर्थिक बेचैनी: युद्ध के कारण तेल-गैस आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है, जिसका असर सब्जी, ट्रांसपोर्ट से लेकर घरेलू रसोई तक पड़ रहा है। विपक्ष इसे मोदी सरकार की विदेश नीति (इजरायल के साथ नजदीकी और पश्चिम एशिया में संतुलन बिगड़ने) से जोड़कर हमला बोल रहा है।
- मोदी फैक्टर vs स्थानीय मुद्दे: भाजपा चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दों पर ले जाना चाहती है, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और युद्ध की आर्थिक थकान जैसे स्थानीय दर्द इस बार भारी पड़ सकते हैं।
असम में भाजपा की सरकार है, लेकिन यहां भी स्थानीय मुद्दे जैसे पहचान, नागरिकता और क्षेत्रीय असंतोष चुनावी गणित पलट सकते हैं। केरल में भाजपा अभी तीसरे नंबर की पार्टी है और सत्ता तक पहुंचना लंबी लड़ाई है। पुडुचेरी में गठबंधन की स्थिति जटिल बनी हुई है।
विपक्ष का प्लान
विपक्षी नेता इस चुनाव को मोदी सरकार की ‘अग्निपरीक्षा’ बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि केंद्र की विदेश नीति ने संतुलन खो दिया है, जिसका खामियाजा देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे नेता असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में जुटे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कागज पर भाजपा के पास मजबूत संगठन, संसाधन और नरेंद्र मोदी जैसे चेहरा है, लेकिन जमीन पर हालात काफी जटिल हैं। राष्ट्रवाद और विकास के नारे के साथ-साथ जनता की रसोई और जेब के मुद्दे भी निर्णायक साबित हो सकते हैं।
फिलहाल स्थिति: भाजपा के लिए ये चुनाव आसान नहीं हैं। मोदी के सामने सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि मौजूदा आर्थिक और सामाजिक हालात भी चुनौती बनकर खड़े हैं। हालांकि राजनीति में आखिरी समय तक कुछ भी बदल सकता है। एक सही नैरेटिव या बड़ा फैसला पूरा खेल पलट सकता है।
ये चुनाव 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। जनता राष्ट्रवाद के नाम पर वोट करेगी या अपनी जलती रसोई को देखते हुए फैसला लेगी — यह 4 मई को साफ हो जाएगा।
रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

